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kuch idhar ki kuch udhar ki

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देर से गूँजतें हैं सन्नाटे जैसे हम को पुकारता है कोई...गुलज़ार  अब पर्वत बर्फ़ानी मत लिख अब नदिया में पानी मत लिख राज मगरमच्छ अब करते हैं मछली जल की रानी मत लिख काम-तृप्ति प्यार हुआ अब मीरा प्रेम दीवानी मत लिख इस पीढ़ी की एक ही ज़िद है इक भी बात पुरानी मत लिख भीगी हुई आँखों का ये मंज़र न मिलेगा घर छोड़ के मत जाओ कहीं घर न मिलेगा फिर याद बहुत आयेगी ज़ुल्फ़ों की घनी शाम जब धूप में साया कोई सर पर न मिलेगा रोज़ मेरे सीने पे लहरें नाबालिग़ बच्चों के जैसे कुछ-कुछ लिखी रहती हैं।

raat abhi baaki hai

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खूबसूरत चाहे जितना भी दिखें पर ये भी सच है कि  शेर कभी पालतू नहीं होते जीने कि उमंग, मस्ती की तरंग  बेफिक्र अंदाज क्योंकि मै आजाद हूँ आज आजादी कि खुशबू मिलते ही झूम उठा है ये घोडा  और हम है कि मिली आजादी को  kabhi काम के नाम पे, कभी आराम के नाम पे कभी हक के नाम पे, तो कभी बदले के नाम पे  कहीं खोते जा रहे हैं...  आजाद होने का सिर्फ नाटक करते जा रहे हैं एक पुराना मौसम लौटा याद भरी तन्हाई भी  ऐसा तो कम ही होता है  वो भी हो तन्हाई भी  हम बेखुदी में तुम को पुकारे चले गए  सारे वो जिंदगी के सहारे चले गए 

ankahii

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जिंदगी का कौन सा मोड़ लूं कि  दुश्वारियां न मिलें, ये सोच सही है या जिंदगी के हर मोड़ की दुश्वारियों से बचना सीख लूं ये सोच सही है? दर्द जितना होगा सुकून भी उतना ही मिलेगा इसीलिए डर भी जितना होगा मजा भी उतना ही आएगा कैमरे से पिक्चर तो खूब खीची होगी न जाने दुनिया कि कौन कौन सी तस्वीर खींची होगी पर क्या दो दुनिया कि तस्वीर खींच सके हो नहीं न, इस तस्वीर में यही तो है शायद!!! घोड़ों का एक साथ मिलकर पानी पीना  कितना खूबसूरत लग रहा है सोचो तुम घर में ऐसे ही खाना खाते दिखो तो कैसा हो!!! न बंगला, न गाड़ी, न कोई सुख,  न ही सुविधा पर फिर भी देखो, हम ऐश कर रहे हैं  बोलो की है तुमने कभी ऐसी ही ऐश!!! नेचर से इतना प्यार करता है इंसान कि पूरी जिंदगी नेचर को मिटाने में लगा देता है सच ही तो कह रहा हूँ... नहीं है यकीन तो जरा इस डोल्फिन को देखो  हाथों में कैमरा बांधे   सीटी  बजते ही पानी से उछल पड़ती है  लोग तालियाँ बजाते हैं और कहते हैं वाह क्या नेचर है!!!  ...

moods & moments

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He is able who thinks he is able- Budha मेरी समझदारी ने मेरी जिंदगी कैसी बना डाली है कि  अब तो पानी में भीगने से डर लगता है, भीग गया तो बीमारी का डर सताता है कीचड तो देखकर  नफरत होती है वो भी क्या दिन थे, जब समझदानी थोड़ी छोटी थी और कीचड में लोट-लोट कर  मस्ती आती थी जिस बारिश का  मजा आज मैं घर में दुबककर चाय पकोडिय़ों में खोजता हूं तब तो सिर्फ घर से निकलते ही सड़क पे  मजा आ जाता था All things are artificial, for nature is the art of God.  बताओ हमारा हीरो कौन वो जो रोज कुछ न कुछ बेचता फिरता है  या वो जो थोड़ा सा खरीद के जिंदगी के मजे ले रहा है  ये पिता अपने बेटे के  पास नहीं बैठ सकता पर उसी के बेटे के पैरों तले बैठा है इसी को परिवार कहते हैं असल से ज्यादा सूद का लालच इंसान में होता है ये पिता भी तो कुछ ऐसा ही करता दिख रहा है बेटे यानी असल की  चिंता नहीं वो तो बस सूद यानी पोते के साथ रहना चाहता है है कोई पश्चिमी देश ऐसा, जह...