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Showing posts from August, 2011

हम ही हम हैं तो क्या हम हैं

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चमन में इख्तिलात-ए-रंगोबू से बात बनती है हम ही हम हैं तो क्या हम हैं तुम ही तुम हो तो क्या तुम हो

आरक्षण

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आरक्षण फिल्म देखी, मुझे नहीं लगता कि इसमें कोई ऐसी बात है,  जो इसे कुछ राज्यों में बैन कर दिया गया... फिल्म में एक जगह मुख्य अभिनेता अमिताभ अपनी पत्नी के सवाल का उत्तर कुछ इस तरह देते हैं... पत्नी- अगर तुम सचमुच पिछड़ों को उठाना चाहते हो तो उनको बेहतर से बेहतर प्राथमिक शिक्षा दो, अलग से स्कूल खुलवा दो, बड़े से बड़े हॉस्टल्स दो, स्कॉलरशिप्स दो. जितनी सुविधाएं देनी हैं दो और उनको कॉम्पटीशन के लिए तैयार करो. ये आरक्षण का कानून क्यों बनाते हो?  अमिताभ- जो तुम कह रही हो, वो तो होना ही चाहिए. और यही हम ठीक से कर नहीं पाए पिछले 60 वर्षों से. इसीलिए आरक्षण और भी जरूरी हो गया. देश की वो आबादी, जो केवल अपने जन्म के कारण पिछड़ी हो, उसके लिए मौके की कम से कम एक खिड़की तो खोलनी पड़ेगी. मुझे लगता है कि ये एक जवाब काफी है.

खेल सिर्फ जीतने के लिए

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खेल में हार या जीत मायने नहीं रखती शायद ये बात उस शख्स ने हारने के बाद ही कही होगी क्योंकि सच ये है कि खेल सिर्फ जीतने के लिए खेला जाता है

दिल की ही सुनूंगा

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ठोकर लगते ही समझ जाग सी जाती है जिंदगी के हर पन्ने को ध्यान से समझने लगता हूं कसम खाता हूं कि अब संभलकर चलूंगा मगर कमबख्त बेसब्री ऐसी चीज है अंदर  कि फिर सब भूल, दिल पर हाथ रखे कदम बढ़ा देता हूं आज फिर एक ठोकर ने गिरा दिया है,  फिर से समझ जाग उठी है कहती है संभल जाओ, वरना बर्बाद होगे कहीं छुपा बैठा मेरा दिल धीमे से फुसफुसाता है अमां हटाओ, क्या खाक बर्बाद होउंगा, आज तक तो हुआ नहीं तो कोशिश कर रहा हूं संभलकर उठने की, आगे चलने की मगर मुझे पता है मैं फिर दिल की ही सुनूंगा क्योंकि ये तो सच है कि आज तक तो मुझे कुछ हुआ नहीं...

zindagi ho chali

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मीठी लगी, चख के देखी अभी मिश्री की डली, जिंदगी हो चली

awaragi

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इक अजनबी झोंके ने जब पूछा मेरे गम का सबब सहरा की भीगी रेत पर मैंने लिखा... आवारगी