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हां, कुछ फोटो फ्रेम भी बचे हैं,

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वो गारा वो पत्‍थर याद है तुम्‍हें  कभी मिलके हमने जोड़ा था  आशियाना बनाया था  वो तस्‍वीर याद है तुम्‍हें  बड़ी खुशी से खिंचवाई थी हमने  वो घड़ी जो  उस साल मेले से खरीद के लाई थी  आज भी टंगी है, मगर रुक गई है  अब भी उसमें वही समय बज रहा है  जब कहर बरपा था हम पर   तुम चली गईं, सब बिखर गया हां, कुछ फोटो फ्रेम भी बचे हैं,  मगर खाली-खाली से बिखरे-बिखरे से। 

तुम न झेल सकीं और अब हम कैसे झेलें

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हर दर्द, हर थपेड़े साथ झेलते चले आ रहे थे  कुछ तुम झेलती, कुछ हम झेलते  बस यूं ही जिये जा रहे थे  कि एक दिन कुदरत का कुछ यूं बरपा कहर तुम न झेल सकीं और जिंदगी छोड़ गईं  अब हम कैसे झेलें, जिंदगी को कैसे छोड़ें।